अर्ध सत्य (Half Truth)

(A poem by Dilip Chitre. Its the theme poem for the movie Ardha Satya (1983) by Govind Nihlani )

 

चक्रव्यूह में घुसने से पहले ,

कौन था मै और  कैसा था ,

यह मुझे याद ही न रहेगा .

चक्रव्यूह में घुसने के बाद ,

मेरे और चक्रव्यूह के बीच ,

सिर्फ एक जानलेवा निकटता थी ,

इसका मुझे पता ही न चलेगा .

चक्रव्यूह से निकलने के बाद ,

मैं मुक्त हो जाऊं भले ही ,

फिर भी चक्रव्यूह की रचना में

फर्क ही न पड़ेगा .Ardh Satya (1982)

मरुँ या मारूं,

मारा जाऊं या जान से मार दुं.

इसका फैसला कभी न हो पायेगा .

सोया हुआ आदमी जब

नींद से उठकर चलना शुरू करता है ,

तब सपनों का संसार उसे ,

दोबारा दिख ही न पायेगा .

उस रौशनी में जो निर्णय की रौशनी है

सब कुछ समान होगा क्या ?

एक पलड़े में नपुंसकता ,

एक पलड़े में पौरुष ,

और ठीक तराजू के कांटे पर

अर्ध सत्य .

1 Comment to “अर्ध सत्य (Half Truth)”

  • Kylie Batt — May 13, 2010 @ 7:58 am

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